Tuesday, May 23, 2006

और मैं रिटायर हो गया

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Tuesday, August 16, 2005

शर्मिंदा कर रही दो ख़बरें


दो ख़बरें सुनने-पढ़ने मिलीं. पहली यह कि एक निजी ख़बरिया चैनल के कुछ कर्मियों ने शराब के नशे में बार कर्मियों और पुलिसवालों के साथ मारपीट की. दूसरी यह कि नेताओं की पोल खोलने का दावा करने वाले एक प्रोडक्शन हॉउस की इमारत पर १४ की शाम से लेकर १६ अगस्त की सुबह तक तिरंगा लहराता रहा. देश-दुनिया के लोगों को जागरूक करने और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास कराने का दावा करने वाले मीडियाकर्मियों के लिए दोनों ख़बरें शर्मनाक हैं. कुछ अरसे पहले ऐसी ही एक ख़बर पढ़ने मिली थी जब सबसे तेज़ होने का दावा करने वाले ख़बरिया चैनल के एक नामी ख़बरनवीस छावनी इलाक़े के नो-पार्किंग ज़ोन में अपनी कार खड़ी करने पर आमादा हो गया और नशे में धुत इस ख़बरनवीस ने ड्यूटी पर तैनात सैनिक से मारपीट की.
अक्सर सुनते आए हैं कि सत्ता का नशा सर चढ़कर बोलता है. इन्हे कौन सा नशा चढा? सत्ता के गलियारों में गूंजती इनकी धमक क्या अब आमजनों का जीना मुहाल करेगी? बैलगाड़ी के नीचे चल रहे कुत्ते को अक्सर ये गुमां हो जाता है कि सारा बोझ उसके कंधों पर है. नीर-क्षीर विवेकी लोगों से मेरी गुज़ारिश है ऐसा कोई भ्रम ना पालें कि हम संविधान और क़ानून से बड़े हो गए हैं.

Sunday, August 14, 2005

मै आज़ाद हूं


भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश (७१ के पहले पूर्वी पाकिस्तान) की आज़ादी का दिन १४-१५ अगस्त हमें यह याद दिलाता है कि हम आज़ाद हो चुके हैं. मुझे ये कहने में कतई संकोच नहीं कि बेशक़ हम आज़ाद हुए हैं लेकिन आज़ादी के दीवानों ने ऐसे देश का सपना नहीं देखा था. आज इतना बड़ा पाखंड इन देशों के सियासतदानों ने खड़ा कर लिया है कि लोकतंत्र दम तोड़ता नज़र आता है. पाकिस्तान और बांग्लादेश का छोड़ दें क्योंकि ये देश जब तक धार्मिक (?) बेड़ियों में जकड़े हुए हैं तब तक किसी तरह की जम्हूरियत की बात करना भी बेमानी होगी. लेकिन भारत की लोकतांत्रिक मान्यताएं यथार्थ में किस कदर खंडित हुई हैं ये आप बखूबी जानते हैं. ५८ साल में हमारा लोकतंत्र इस कगार पर आ पहुंचा है जहां क़ानून तोड़ने वाले संसद में बैठकर आम आदमी के लिए क़ानून बनाते देखे जा रहे हैं. एक डाकू खुलेआम कहता है कि फ़लां मुख्यमंत्री मेरे भाई समान है. डाकूजी को धन्यवाद जिसने एक बड़े राज्य के मुख्यमंत्री को अपने पाले में रखने का साहस दिखाया. कहीं कुछ गड़बड़ है. वो घोड़े वाले डाकुओं के दिन लदे तो अब सफ़ेद चमचमाती कारों वाले डाकुओं के दिन आ चुके हैं. ऐसे में ज़ाहिर है कि चंबल के दस्यु भी राजनीति का मोह कैसे छोड़ दें. जो सदन ५९ साल पहले नेहरू, आंबेडकर, मौलाना आज़ाद, चेट्टियार, राजेंद्र प्रसाद, जैसों की मौजूदगी का गवाह था, आज अपने दामन में सवा सौ दाग़ियों का दाग़ लिए अपने को शर्मिंदा महसूस करता होगा. ये चारा चोर, गुजरात-दिल्ली के जनसंहारों में शामिल ये नराधम, इस लोकतंत्र के पहरेदार बन बैठे हैं. ये मुंबई-भागलपुर समेत तीन हज़ार छोटे-बड़े दंगों के गुनहगार देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण रखने का दावा कर रहे हैं.

इनको अपनों के बीच झंडा थामे ऱखने का हक़ हम ही ने तो दिया है. ये लोग ही आज इस पावन दिन पर तिरंगे को हवा में लहराएंगे और जयहिंद का जयघोष करेंगे, हम तालियां पीटेंगे. लेकिन हमारा अंतर्मन छातियां पीटता है. मातम करता है कि क्या से क्या बना डाला है हमने मुल्क़ों को. हम चुप रहेंगे क्योंकि सदियों पुरानी आदत है ग़ुलामी की. आओ तुर्को, मुग़लों, डचों, अंग्रेज़ों हमें आप ही संभालो. आओ अपने 'ख़ानदान' की विरासत संभालो. आओ धर्म के ठेकेदारों, भगवा चोला उतारो और कुर्सी पर विराजो. आओ मेरे आका! क्योंकि हम बुद्धिजीवी (?) पहले ही मान चुके हैं राजनीति गंदा खेल है. तो क्या गंदों के लिए छोड़ दिया जाए ??

बड़ी तरक्क़ी कर ली इन दशकों में हमने. चंद सरमायेदारो की पूंजी में हो रहा दूगुना- तिगुना इज़ाफ़ा पूरे देश की माली हालत का थर्मामीटर बन गया है. करोड़पतियों की तादाद में बढ़ोतरी की ख़बरों से हमें सुकून मिलता है. बाज़ार में ख़र्च हो रहे बिग बी हमें सिखाते हैं कि उम्मीद (जिसका हक़ कतई नहीं है) से दोगुना कैसे कमाया जाए. कैसे हम लाखों फ़ोन और एसएमएस करके बाज़ारतंत्र के पुर्ज़े बनकर अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हैं. लेकिन हमने क्या ये सोचा कि देश के हर नागरिक की आय में दूगुना-तिगुना इज़ाफ़ा क्यों नहीं हो रहा है? क्यों 'दुनिया के नक़्शे पर तेज़ी से उभरते भारत'- जैसी ख़बरों के बीच ये अंदाज़ लगाना मुश्किल हो रहा है कि हम कहां जा रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ का मानव विकास सूचकांक बताता है कि हम दुनिया के १७७ देशों में १२७वें नंबर पर हैं हमारा सहोदर पाकिस्तान १४२ और बांग्लादेश १३८वें नंबर पर आता है. यह वो पैमाना है जिसमें किसी भी देश के समग्र विकास को आंका जाता है.

आंकड़ें साफ़ बताते हैं कि समाजवादी लोककल्याणकारी राज्य की परिकल्पना कचरे की पेटी में डाल दी गई है. उधारीकरण के दौर में गहराती आर्थिक विषमता की ओर हम आंख मूंद कर बैठे हैं. यक़ीनन देश में करोड़पतियों की तादाद में इज़ाफ़ा हुआ है, लेकिन इसी देश में हर साल तक़रीबन पौने दो करोड़ नए नागरिक जन्म लेते हैं. ग़रीबी रेखा के नीचे जी रही २६ करोड़ की आबादी जस की तस बनी हुई है. जिन लोगों ने उड़ीसा, बिहार, छत्तीसगढ़ और आंध्र के देहाती इलाक़ों के हालात का जायज़ा लिया हो वो कैसे यक़ीन कर सकते हैं कि देश फ़ीलगुड कर रहा है. जाकर तमिलनाडु के तिरपुर के लोगों से पूछो कैसे उधारीकरण ने घरेलू बाज़ार का भठ्ठा बिठाया है. उड़ीसा के रायगढ़ा, छत्तीसगढ़ के बस्तर जाकर देखें कि आदिवासी किस तरह अपनी ही ज़मीन से बेदख़ल किए जा रहे हैं. इनके रहवास का विधेयक सालों से सदन में अपने पारित होने की बांट जोह रहा है. संसद को कब फ़ुर्सत मिलेगी विरोध के लिए विरोध की राजनीति से - ये मालिक जानें. डेढ़ लाख से ज़्यादा छोटे-मंझोले उद्योग चरमरा चुके हैं और लाखों बेरोज़गार हुए हैं और रहनुमा दावा करते हैं हर चुनाव पर कि करोड़ों को रोज़गार मिलेगा. पंजाब के चंद किसानों को पंचतारा संस्कृति में सराबोर दिखाकर ये मीडिया ये दावा कैसे कर सकती है कि देश का आम किसान-मज़दूर फ़ीलगुड कर रहा है. उसी पंजाब में, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में आज भी किसान आत्महत्या करने पर विवश हैं. क्या ये हम भूल जाएं. ? क्या हमारी नई सरकार ये भूल गई कि पिछली सरकार के इसी फ़ीलगुड के नारे की आमजनता ने किस कदर हवा निकाली थी. अफ़सोस कि आज मनमोहन सिंह भी कुछ इसी तर्ज पर बातें करते हैं. वरना वे ऑक्सफ़ोर्ड में ये नहीं कहते हैं कि नाउ इंडिया इज़ रियेली शाइनिंग. इंडिया टुडे और आऊटलुक के ताज़ा अंक शायद यह न कहते कि भारत खुशहाल हो रहा है. एमएनसीज़ में काम करने वालों की तादाद में हो रहे इज़ाफ़े और इनके भयावह परिणामों व अनिश्चिंतता पर कभी और चर्चा करूंगा.

मध्यवर्गीय, उच्च मध्यवर्गीय और नीश क्लास लोगों के आसपास इकट्ठा हुआ बाज़ार और उसकी बाग़डोर थामे ईस्ट इंडियानुमा एमएनसीज़ तथा उनके इशारे पर दुम हिलाते चैनल्स-न्यूज़पेपर्स लगातार ये शोर मचाते हैं कि देखो इंडिया इज़ रियेली शाइनिंग. रियेली इज़ इट?

तुम्हारे पांव के नीचे ज़मीन नहीं
कमाल है तुम्हें फिर भी यक़ीन नहीं (दुष्यंत कुमार)

आज़ादी के दीवाने



पंजाब केसरी में आज स्वाधीनता दिवस पर प्रकाशित ये कार्टून बहुत कुछ कह रहा है.

Saturday, August 13, 2005

द राइज़िंग- प्रशंसनीय प्रयास


निष्णात् सिने-समीक्षक जयप्रकाश चौकसे (इंदौर वाले) का ताज़ा लेख जो आमिर ख़ान की फ़िल्म द राइज़िंग पर केंद्रित है – आपके लिए यहां जस का तस प्रकाशित कर रहा हूं – उम्मीद है कि चौकसे की लेखन-शैली भी रूचिकर लगेगी.

द राइज़िंग- प्रशंसनीय प्रयास
संत रामदास के कथा वाचन की प्रशंसा सुनकर स्वयं श्री हनुमान साधारण आदमी के वेष में कथा सुनने पहुंचे. प्रसंग था अशोक वाटिका में शोक संतप्त सीता की व्यथा का. कथावाचक ने सफ़ेद फूलों से आच्छादित वाटिका में सीता माता के दुख का वर्णन किया. हनुमान जी ने प्रतिवाद किया कि फूल लाल थे, यहां तक कि उन्होंने अपना विराट स्वरूप भी दिखाया, परंतु कथा वाचक टस से मस नहीं हुए. नाराज़ हनुमान ने श्री राम से शिकायत की तो श्री राम ने कहा कि सीता का दुख देखकर हनुमान की आंखों में ख़ून के डोर उतर आए थे इसीलिए उन्हें सफ़ेद फूल लाल दिखे थे. कथावाचक ग़लत नहीं था.

केतन मेहता और आमिर ख़ान भी कथा वाचक हैं और मंगल पाण्डेय की कथा की अपनी व्याख्या के लिए स्वतंत्र हैं. इतिहास आधारित फ़िल्मों को केवल सिनेमा के मानदंड पर देखना चाहिए, न कि पाठ्यक्रम के इतिहास की तरह. द राइज़िंग में मंगल पाण्डेय के सत्य के साथ कल्पना के रेशे हैं और फ़िल्म के आरंभ में ही कहा गया है कि जहां इतिहास और किवदंती मिलते हैं यह कथा वहां जन्मी है. इस फ़िल्म मे उस दौर का सामाजिक सत्य उभरकर आया है और ईस्ट इंडिया कंपनी की घिनौनी हरकतों को प्रस्तुत किया गया है. कंपनी के अफ़सर अफ़ीम का अवैध व्यापार करते हैं और भारतीय खेतों में अफ़ीम पैदा करवाते हैं फिर चीन में बेचते हैं. इस अंतरराष्ट्रीय अपराध में वे हुक़मरान भी शामिल थे जो लंदन में बैठे थे. इसी तरह यह भी प्रस्तुत है कि क़ानूनी तौर पर सती प्रथा के समाप्त हो जाने के बाद भी वह प्रथा जारी थी. व्यापार करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी आज भी नए मुखौटे पहनकर ज़िंदा है. आज उन्हें मल्टीनेशनल का सम्मानजनक नाम प्राप्त है, परंतु हरकतें वहीं हैं. ग़ौरतलब है कि अस्पताल के दृश्य में मंगल पाण्डेय कहता है कि विद्रोह की चिनगारी इस बात से पैदा हुई थी कि नई कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी है, परंतु सच्चाई यह है कि हमें स्वतंत्रता चाहिए. इस पवित्र आंदोलन में अब चर्बी गौण है और आत्मसम्मान प्रमुख है. इस फ़िल्म में दो दोस्तों की कहानी है- अंग्रेज़ और भारतीय योद्धा. वीरता के समान मंच पर पनपी इस मित्रता के महत्वपूर्ण मोड़ पर मंगल पाण्डेय कहता है कि यह रंग का भेद नहीं मिट सकता. इस फ़िल्म में दो प्रेम कहानियां समानांतर चलती हैं- मंगल और तवायफ़ हीरा तथा अंग्रेज़ गोर्डन और युवा लड़की, जिसे सती होने से उसने बचाया था. फांसी के पहले हीरा जेल में आकर मंगल से कहती है कि उसकी मांग भर दे. यह अत्यंत मार्मिक है. यह नाज़ुक प्रेमकथा उस पौधे की तरह है जो हालात के पत्थरों के बीच थोड़ी-सी मिट्टी में पनपता है और यथार्थ के पैरों तले उसका कुचला जाना ही उसकी नियति है. गोर्डन और ज्वाला तथा मंगल और हीरा के मिलन के एकमात्र दृश्य में रसिया नामक लोकगीत का प्रयोग सिनेमैटिक लहर पैदा करता है. आमिर ख़ान इतने महान अभिनेता हैं कि चर्बी की फ़ैक्ट्री वाले दृश्य में उनकी नाक पर हल्का कंपन बदबू को स्थापित करता है.

आज आमिर भारत के श्रेष्ठतम अभिनेता हैं. द राइज़िंग एक गंभीर सिनेमाई प्रयास है और आमिर तथा केतन मेहता बधाई के पात्र हैं. फूहड़ और सतही मनोरंजन से बिगड़ी हुई रूचियों वाले पॉपकॉर्न दर्शकों के लिए यह दालबाटीनुमा गरिष्ठ भोजन पचा पाना शायद मुश्किल होगा.
फ़िल्म की आधिकारिक साइट यहां देखें और यह साइट भी कम रोचक नहीं है. द राइज़िंग के गीत यहां सुने जा सकते हैं.

Friday, August 12, 2005

बर्बाद तमन्ना पे अताब और ज़्यादा

मजाज़ को जाने..समझने का दावा बिना पढ़े कतई ना करें
छोटा-सा परिचय - उत्तरप्रदेश के बाराबांकी ज़िले के रुदौली में १९०९ में जन्में असरार उल हक़ की शुरूआती तालीम लखनऊ और बाद आगरा में हुई. १९३६ में आपने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीए किया. ये वो दौर था जब अलीगढ़ यूनीवर्सिटी में प्रगतिशील आंदोलन की शुरूआत हुई थी. मजाज़ खुद इससे प्रभावित थे. आपने ऑल इंडिया रेडियो में भी काम किया लेकिन बाद किन्हीं मतभेदों के चलते इसे छोड़ दिया. आप प्रगतिशील (प्रोगेसिव मूवमेंट) आंदोलन की पत्रिका नया अदब के संस्थापकों में से एक थे. माना जाता है कि फनी बदायूंनी आपके उस्ताद थे. शायद पढ़नेवालों को पता हो कि मजाज़ आज के दौर के मशहूर गीतकार जावेद अख़्तर के मामा हैं. ये तो पता ही होगा कि जावेद साहब अपने ज़माने के मशहूर गीतकार जां निसार अख़्तर के बेटे हैं. मजाज़ पर वापस लौटें, मजाज़ का पहला ग़ज़ल संग्रह 'आहंग' १९३८ में आया. इसके बाद १९४५ में 'शब-ए-ताब' और 'साज़-ए-नौ' भी प्रकाशित हुए. मक़बूल नज़मों में 'आवारा', 'रात और रेल' के अलावा 'अंधेरी रात का मुसाफ़िर' भी अहम है. पांच दिसम्बर १९५५ को लखनऊ में मजाज़ इस दुनिया से चल बसे.

असरार उल हक़ 'मजाज़' की ये ग़ज़ल दिखाई पढ़ी. सबसे नीचे दिए गए चंद लफ़्ज़ों के मायने आपके लिए मददगार हो सकते हैं.

बर्बाद तमन्ना पे अताब और ज़्यादा
हां मेरी मोहब्बत का जवाब और ज़्यादा


रोए ना अभी अहल-ए-नज़र हाल पे मेरे
होना है अभी मुझको ख़राब और ज़्यादा


आवारा-वा-मजनूं ही पे मौक़ूफ़ नहीं कुछ
मिलने हैं अभी मुझको ख़िताब और ज़्यादा

उठेंगे अभी और भी तूफ़ां मेरे दिल से
देखूंगा अभी इश्क़ के ख़्वाब और ज़्यादा


टपकेगा लहू और मेरे दीदा-ए-तर से
धधकेंगे दिल-ए-ख़ाना-ख़राब और ज़्यादा


ऐ मुतरिब-ए-बेबाक कोई और भी नग़मा
ऐ साक़ी-ए-फ़याज़ शराब और ज़्यादा

(अताब- ग़ुस्सा; मौक़ूफ़-निर्भर; दीदा ए तर- नम आंखें; मुतरिब- गायक)

Tuesday, August 09, 2005

एक हफ़्ते की माथापच्ची के बाद आज इन्स्क्रिप्ट की-बोर्ड पर यूनीकोड फॉट टाइप करने का तरीका आ ही गया... सलाह के लिए जीतेंद्र और रमन कौल को साधुवाद. माइक्रोसाफ्ट का इण्डिक आइ-एम-ई लोड कर लिया है. बड़ी मशक़्क़त के बाद चलाना भी सीख लिया. यार ख़बरनवीस हूं मुझे तकनीक की इतनी समझ कहां ? नेटसाधुओं को एक बार फिर साधुवाद. जिनको इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड में यूनीकोड फॉट पर हिन्दी टाइप करना हो तो ये बढ़िया संपादक है. कम से कम मेरे उस संपादक से तो बेहतर है.