
भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश (७१ के पहले पूर्वी पाकिस्तान) की आज़ादी का दिन १४-१५ अगस्त हमें यह याद दिलाता है कि हम आज़ाद हो चुके हैं. मुझे ये कहने में कतई संकोच नहीं कि बेशक़ हम आज़ाद हुए हैं लेकिन आज़ादी के दीवानों ने ऐसे देश का सपना नहीं देखा था. आज इतना बड़ा पाखंड इन देशों के सियासतदानों ने खड़ा कर लिया है कि लोकतंत्र दम तोड़ता नज़र आता है. पाकिस्तान और बांग्लादेश का छोड़ दें क्योंकि ये देश जब तक धार्मिक (?) बेड़ियों में जकड़े हुए हैं तब तक किसी तरह की जम्हूरियत की बात करना भी बेमानी होगी. लेकिन भारत की लोकतांत्रिक मान्यताएं यथार्थ में किस कदर खंडित हुई हैं ये आप बखूबी जानते हैं. ५८ साल में हमारा लोकतंत्र इस कगार पर आ पहुंचा है जहां क़ानून तोड़ने वाले संसद में बैठकर आम आदमी के लिए क़ानून बनाते देखे जा रहे हैं. एक डाकू खुलेआम कहता है कि फ़लां मुख्यमंत्री मेरे भाई समान है. डाकूजी को धन्यवाद जिसने एक बड़े राज्य के मुख्यमंत्री को अपने पाले में रखने का साहस दिखाया. कहीं कुछ गड़बड़ है. वो घोड़े वाले डाकुओं के दिन लदे तो अब सफ़ेद चमचमाती कारों वाले डाकुओं के दिन आ चुके हैं. ऐसे में ज़ाहिर है कि चंबल के दस्यु भी राजनीति का मोह कैसे छोड़ दें. जो सदन ५९ साल पहले नेहरू, आंबेडकर, मौलाना आज़ाद, चेट्टियार, राजेंद्र प्रसाद, जैसों की मौजूदगी का गवाह था, आज अपने दामन में सवा सौ दाग़ियों का दाग़ लिए अपने को शर्मिंदा महसूस करता होगा. ये चारा चोर, गुजरात-दिल्ली के जनसंहारों में शामिल ये नराधम, इस लोकतंत्र के पहरेदार बन बैठे हैं. ये मुंबई-भागलपुर समेत तीन हज़ार छोटे-बड़े दंगों के गुनहगार देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण रखने का दावा कर रहे हैं.
इनको अपनों के बीच झंडा थामे ऱखने का हक़ हम ही ने तो दिया है. ये लोग ही आज इस पावन दिन पर तिरंगे को हवा में लहराएंगे और जयहिंद का जयघोष करेंगे, हम तालियां पीटेंगे. लेकिन हमारा अंतर्मन छातियां पीटता है. मातम करता है कि क्या से क्या बना डाला है हमने मुल्क़ों को. हम चुप रहेंगे क्योंकि सदियों पुरानी आदत है ग़ुलामी की. आओ तुर्को, मुग़लों, डचों, अंग्रेज़ों हमें आप ही संभालो. आओ अपने 'ख़ानदान' की विरासत संभालो. आओ धर्म के ठेकेदारों, भगवा चोला उतारो और कुर्सी पर विराजो. आओ मेरे आका! क्योंकि हम बुद्धिजीवी (?) पहले ही मान चुके हैं राजनीति गंदा खेल है. तो क्या गंदों के लिए छोड़ दिया जाए ??
बड़ी तरक्क़ी कर ली इन दशकों में हमने. चंद सरमायेदारो की पूंजी में हो रहा दूगुना- तिगुना इज़ाफ़ा पूरे देश की माली हालत का थर्मामीटर बन गया है. करोड़पतियों की तादाद में बढ़ोतरी की ख़बरों से हमें सुकून मिलता है. बाज़ार में ख़र्च हो रहे बिग बी हमें सिखाते हैं कि उम्मीद (जिसका हक़ कतई नहीं है) से दोगुना कैसे कमाया जाए. कैसे हम लाखों फ़ोन और एसएमएस करके बाज़ारतंत्र के पुर्ज़े बनकर अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हैं. लेकिन हमने क्या ये सोचा कि देश के हर नागरिक की आय में दूगुना-तिगुना इज़ाफ़ा क्यों नहीं हो रहा है? क्यों 'दुनिया के नक़्शे पर तेज़ी से उभरते भारत'- जैसी ख़बरों के बीच ये अंदाज़ लगाना मुश्किल हो रहा है कि हम कहां जा रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ का मानव विकास सूचकांक बताता है कि हम दुनिया के १७७ देशों में १२७वें नंबर पर हैं हमारा सहोदर पाकिस्तान १४२ और बांग्लादेश १३८वें नंबर पर आता है. यह वो पैमाना है जिसमें किसी भी देश के समग्र विकास को आंका जाता है.
आंकड़ें साफ़ बताते हैं कि समाजवादी लोककल्याणकारी राज्य की परिकल्पना कचरे की पेटी में डाल दी गई है. उधारीकरण के दौर में गहराती आर्थिक विषमता की ओर हम आंख मूंद कर बैठे हैं. यक़ीनन देश में करोड़पतियों की तादाद में इज़ाफ़ा हुआ है, लेकिन इसी देश में हर साल तक़रीबन पौने दो करोड़ नए नागरिक जन्म लेते हैं. ग़रीबी रेखा के नीचे जी रही २६ करोड़ की आबादी जस की तस बनी हुई है. जिन लोगों ने उड़ीसा, बिहार, छत्तीसगढ़ और आंध्र के देहाती इलाक़ों के हालात का जायज़ा लिया हो वो कैसे यक़ीन कर सकते हैं कि देश फ़ीलगुड कर रहा है. जाकर तमिलनाडु के तिरपुर के लोगों से पूछो कैसे उधारीकरण ने घरेलू बाज़ार का भठ्ठा बिठाया है. उड़ीसा के रायगढ़ा, छत्तीसगढ़ के बस्तर जाकर देखें कि आदिवासी किस तरह अपनी ही ज़मीन से बेदख़ल किए जा रहे हैं. इनके रहवास का विधेयक सालों से सदन में अपने पारित होने की बांट जोह रहा है. संसद को कब फ़ुर्सत मिलेगी विरोध के लिए विरोध की राजनीति से - ये मालिक जानें. डेढ़ लाख से ज़्यादा छोटे-मंझोले उद्योग चरमरा चुके हैं और लाखों बेरोज़गार हुए हैं और रहनुमा दावा करते हैं हर चुनाव पर कि करोड़ों को रोज़गार मिलेगा. पंजाब के चंद किसानों को पंचतारा संस्कृति में सराबोर दिखाकर ये मीडिया ये दावा कैसे कर सकती है कि देश का आम किसान-मज़दूर फ़ीलगुड कर रहा है. उसी पंजाब में, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में आज भी किसान आत्महत्या करने पर विवश हैं. क्या ये हम भूल जाएं. ? क्या हमारी नई सरकार ये भूल गई कि पिछली सरकार के इसी फ़ीलगुड के नारे की आमजनता ने किस कदर हवा निकाली थी. अफ़सोस कि आज मनमोहन सिंह भी कुछ इसी तर्ज पर बातें करते हैं. वरना वे ऑक्सफ़ोर्ड में ये नहीं कहते हैं कि नाउ इंडिया इज़ रियेली शाइनिंग. इंडिया टुडे और आऊटलुक के ताज़ा अंक शायद यह न कहते कि भारत खुशहाल हो रहा है. एमएनसीज़ में काम करने वालों की तादाद में हो रहे इज़ाफ़े और इनके भयावह परिणामों व अनिश्चिंतता पर कभी और चर्चा करूंगा.
मध्यवर्गीय, उच्च मध्यवर्गीय और नीश क्लास लोगों के आसपास इकट्ठा हुआ बाज़ार और उसकी बाग़डोर थामे ईस्ट इंडियानुमा एमएनसीज़ तथा उनके इशारे पर दुम हिलाते चैनल्स-न्यूज़पेपर्स लगातार ये शोर मचाते हैं कि देखो इंडिया इज़ रियेली शाइनिंग. रियेली इज़ इट?
तुम्हारे पांव के नीचे ज़मीन नहीं
कमाल है तुम्हें फिर भी यक़ीन नहीं
(दुष्यंत कुमार)