Saturday, August 06, 2005

मित्र ऐसे कि ख़ून के रिश्ते फीकें पड जाऎ


मित्र बनाने और आजीवन निभाने की परंपरा
(छतीसगढ की मिट्टी से ही मैं आया हूं लिहाज़ा Friendship Day पर यह आलेख प्रासंगिक बन पडा है. पूरा आलेख पढने के लिए यहां क्लिक करें )

भारत में फ़्रेंडशिप डे मनाने की प्रथा भले आज चलन में आई हो, छत्तीसगढ़ में मित्र बनाने और मित्रता निभाने की एक लंबी सांस्कृतिक परम्परा रही है. अगस्त के पहले रविवार को मनाया जाने वाला फ़्रेंडशिप डे तो एक दिन का मामला है लेकिन छत्तीसगढ़ की यह परंपरागत मित्रता ऐसी होती है कि इसके आगे ख़ून के रिश्ते फीके पड़ जाएँ.

मित्र बनाने की इस परम्परा में ना उम्र का बंधन है, ना ही जाति या वर्ण का. एक बार मित्र बन गए तो जीवन भर उस मित्रता का निर्वाह सगे रिश्ते-नातों से कहीं बढ़कर किया जाता है.

मितान बदना

मित्र बनाने की इस परम्परा को छत्तीसगढ़ में मितान या मितानिन 'बदना' कहते हैं. इस 'बदना' का मतलब है एक तरह से अनुबंध की औपचारिकता. दो पुरुष या दो महिलाएँ आपस में एक दूसरे को मितान बनाने के लिए एक दिन नियत करते हैं और मितान बद लेते हैं.

कहीं फूलों का आदान-प्रदान किया और मित्र बन गए, तो कहीं गंगा जल या तुलसी के पत्तों का आदान-प्रदान हुआ. एक छोटे-से आयोजन में गौरी-गणेश और कलश की पूजा के बाद एक दूसरे को कोई पवित्र चीज़ देकर मितान 'बदा' जाता है.

कहीं-कहीं एक दूसरे का नाम अपने हाथों पर गुदवा कर (यानी उसका नाम अपने हाथ में स्थाई टैटू की तरह लिखवाकर) मितान बनने की भी परम्परा है. हालांकि स्वाभाविक सामाजिक परिवेश की वजह से इस परंपरा का विस्तार दो विपरीत लिंग वाले लोगों के बीच नहीं हो सका. यानी कोई पुरुष किसी महिला के साथ मितान नहीं बद सकता.

पीढ़ियों का साथ

इस मित्रता के कई नाम हैं, हालांकि व्यावहारिक रुप से सब एक से ही हैं. मितान बनाने के लिए आदान प्रदान की जाने वाली चीज़ के आधार पर इनके नाम भी हैं- भोजली मितान, दौनापान, गंगाजल, सखी, महाप्रसाद, गोदना, गजामूंग.

दो पुरुष आपस मे मितान होते हैं और दो महिलाएँ मितानिन. श्रावण मास की सप्तमी को धान के बीज बो कर उसे पूजने की परम्परा यहां रही है, जिसे भोजली कहा जाता है.
रक्षाबंधन के दूसरे दिन इस भोजली को विसर्जित किया जाता है. छत्तीसगढ़ में एक दूसरे को इसी भोजली को कानों में लगा कर भोजली मितान बनाने की प्रथा चलन में ज़्यादा है.

एक बार मितान या मितानिन बन जाने के बाद मित्र को नाम ले कर संबोधित करने की परंपरा नहीं है. जब भी मित्र को संबोधित करना होगा तो केवल मितान कह कर या जिस परम्परा के तहत मितान बदा गया है, उसे ही संबोधन के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

किसी ने आपस में प्रसाद का आदान-प्रदान कर एक दूसरे को मित्र बनाया है तो दोनों आजीवन एक दूसरे को महाप्रसाद के नाम से संबोधित करेंगे.

इसी तरह किसी महिला ने अगर मोगरे का फूल देकर मितानीन बनाया है तो वे एक-दूसरे को लिए फूलमोंगरा या मोंगराफूल के संबोधन का इस्तेमाल करेंगी.

4 Comments:

Blogger à¤†à¤¶à¥€à¤· कुमार said...

मै इस परंपरा से वकिफ हुं, लेकिन इस ओर कभी ध्यान ही नही गया कि Friendship day और हमारी अपनी छत्तीसगडी पंरपरा एक ही सिक्क़े के दो पहलु है.
आशिष

6:40 AM  
Blogger Raviratlami said...

त कइसे नीरज भइया, तें हर भोजली अउर जवांरा ल भुला गेस.

महूं हर छत्तीसगढ़िया हावों.

नंदगइहां.

पर कमाए खाए खातिर निकलेंव त रतलामी बन गेंव

का करबे.

किसमत के बात.

अउ बने बने.

रवि

11:07 PM  
Anonymous जयप्रकाश मानस said...

भईया , तुंहार ब्लाग ला मयं आज देखेंव. बढ़िया काम करत हव जी । फर्सत पाहू कभ्भू तो देखहु हमरो ब्लाग ला । http://srijansamman.blogspot.com

1:15 PM  
Blogger Great Future said...

Unlimited Earnings Potential - http://1greatfuture.com

Our company is rapidly growing and offers you an extraordinary income helping others succeed. The primary requirement is to follow up on client inquiries and point them in the right direction. It is stress free, rewarding and straightforward work.

For complete details: http://1greatfuture.com


(Please feel free to delete this post if you don't want it on your blog. Thanks for the informative blog and opportunity to post.)

6:37 PM  

Post a Comment

<< Home