Sunday, August 07, 2005

दोस्ती जब किसी से की जाए

दोस्ती जब किसी से की जाए,
दुश्मनों की भी राय ली जाए.

मौत का ज़हर है फिज़ाऒ में,
अब कहां जा के सांस ली जाए.

बस इसी सोच में डूबा हुआ,
ये नदी कैसे पार की जाए.

मेरे माज़ी के ज़ख़्म भरने लगे,
आज फिर कोई भूल की जाए.

बोतलें खोलके तो पी बरसों,
आज दिल खोल कर पी जाए.

(माज़ी - past, old days)

2 Comments:

Blogger Vinay said...

नीरज,

एक अनुरोध। बेहतर होगा अगर आप शायर का नाम भी लिखें। नाम पता न हो तो कम से कम ये ज़रूर जताएँ कि ये किसी और का लिखा है। बहुत संभव है कि इन्हें कई लोग आप की रचना समझ लें। ऐसा तो आप नहीं चाहेंगे।

4:09 PM  
Blogger Neeraj said...

विनय,
आइंदा ऐसा नहीं होगा. दरअसल शेर तो याद रह जाते हैं लेकिन सुख़नवर का नाम याद नहीं रहता. ख़ासकर वे जो कम पढ़े जाते हैं. आगे कोशिश रहेगी कि जिन शेरों के लिखनेवाले याद ना आएं तो उन्हें अनाम के हवाले किया जाएगा. पढ़नेवाले किसी को शायर का नाम याद आ जाए तो वो जोड़ देगा. हैं ना बढ़िया आइडिया ?.. मुझे मुफ़्त में क्रेडिट लेने का शौक़ कभी न रहा.. तौबा- तौबा.

10:30 AM  

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