Monday, August 08, 2005

क़ातिल का फ़ैसला है ख़ुद क़ातिल के हाथ.


दिल्ली और गुजरात - १९८४ और २००२

सोमवार ८ अगस्त को सिख दंगों की जांच के लिए बने नानावटी आयोग की रिपोर्ट देश की संसद के पटल पर रखी गई. ८४ के दंगों में अकेली दिल्ली में तीन हज़ार सरदार मारे गए थे. वेद मारवाह कमेटी से नानावटी आयोग तक कुल नौ आयोग और कमेटियां बन चुके हैं और तीन हज़ार लोगों की हत्या के लिए सिर्फ़ नौ लोगों को अब तक दोषी क़रार दिया गया है. यानी हमारी वो सरकार जो ८४ से लेकर ८९ और फिर ९१ से ९६ तक सत्ता में रही और २००४ में सरदार मनमोहन सिंह की अगुवाई में फिर सत्ता पर काबिज़ होती है - ने इन २१ सालों मे ये जांच करके बताया कि ३ हज़ार लोगों को सिर्फ़ ९ लोगों ने मार दिया वो भी तीन दिनों तक ये लोग दिल्ली की गलियों मे घूम घूम कर सरदारों के सर कलम कर रहे थे और सरकारी अमला नपुंसकों के जैसे हाथ बांधे खडा था.

नानावटी को दंगों में शामिल लोगों के खिलाफ़ कोई सुबूत नहीं मिलते हैं. जिन रसूखदारों पर उंगलियां उठती हैं, जिन पर शक़ ज़ाहिर किया जाता है तो सरकार उन्हें बचा ले जाती है. इन मंत्रियों के ख़िलाफ़ अगर कोई सर उठा ले और गवाही देने आगे आ भी जाय तो धन- बल से उसका मुंह बंद कर दिया जाता है. ठीक वैसे जैसे बेस्ट बेकरी मामले में होता है. कैसे सर्वोच्च न्यायालय की लताड सुनकर भी इन्हें शर्म ना आती हो . कैसे कल तक मोदी को मुस्लिम द्रोही बताने वाली ज़ाहिरा पलटकर तीस्ता सीतलवाड को ही कटघरे में ले आती है. कैसे इन बेशर्मों को ये कहने से भी गुरेज़ नही होता कि गुजरात को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है. ये है हिन्दुत्व की एक सरकार और दूजी है सेक्यूलरिज़्म का दंभ भरने वाली कांग्रेस सरकार ! जिसके बारे में नानावटी आज ये तो कह ही देते हैं कि ८४ के दंगों मे कांग्रेस की स्थानीय इकाइयों का हाथ था. अब इसी नानावटी के ज़िम्मे गुजरात दंगों की जांच भी हो रही है.

ऐसी सरकार जिसका प्रधानमंत्री (अब दिवंगत) कहता है - जब कोई बडा वृक्ष गिरता है तो आसपास की धरती हिलती ही है ! वो मुख्यमंत्री है जो कहता है कि गुजरात का तांडव गोधरा की परिणीति है - एक्‍शन क। रिएक्‍शन !! एक लोकतांत्रिक देश जो अपने धर्म निरपेक्ष होने का दावा करता हो जहां की सरकारें दंगों को वोट बटोरने वाला प्रायोजित कार्यक्रम बनाती हों - जहां सरकारी तंत्र षडयंत्र का हिस्सा बन जाता हो - जहां चुन चुनकर मुसलमानों, सिखों और दलितों को निशाना बनाया जाता हो, गवाह रातों-रात बदल दिये जाते हों और आरोपी बा इज़्ज़त बरी हो जाते हों - वहां किस इंसाफ़ की उम्मीद करें ?


इंसाफ़ क्या मिलेगा किसी दादेख़्वा को,
क़ातिल का फ़ैसला है ख़ुद क़ातिल के हाथ.

1 Comments:

Blogger Jitendra Chaudhary said...

बहुत अच्छे मियाँ....
यही तो हिन्दुस्तान की नियति है, पहले हम अंग्रेजों के गुलाम रहे, और आजादी के बाद से भ्रष्ट राजनेताओं के. गुलामी मे कुछ खास परिवर्तन नही दिखता. अंग्रेजो की फूट डालो और राज करो की नीति को इन राजनेताओ ने बखूबी यूज किया है.

3:15 AM  

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