Saturday, August 06, 2005

अब दिल का दर्द लेकर

कल अख़बार में शकील बदायुनी का ये शेर पढा, भा गया, आप भी देखें

अब दिल का दर्द लेकर इन्क़लाब आया तो क्या,
एक दोशीज़ा पर ग़ुरबत में शबाब आया तो क्या.
अब तो आंखों पे ग़म - ए - हस्ती के पर्दे पड गए,
अब कोई हुस्न- ए- मुज़स्सिम बेनक़ाब आया तो क्या.

(दोशीज़ा- लडकी; ग़ुरबत- ग़रीबी; हुस्न-ए-मुज़स्सिम-सिर से लेकर पैर तक)

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