Saturday, August 06, 2005

मेरे अपने मुझे नफ़रत की सज़ा देते हैं

Friendship Day को दोस्ती की यादगार कहो या दोस्त बनाने का बेहतरीन मौक़ा. अपना तजुर्बा हमेशा ही उल्टा रहा है कुछ इन ग़ज़लों की तरह. अपने में ही रही होगी कोई कमी.. तभी इस कम्ब्ख़त को ये सब रोना - धोना याद आ जाता है. आप भी हमख़्याल हो तो दो आंसू आप भी बहा लीजिए.. पहले ये शेर पढिए-

मैने दुश्मन को भी अहसास-ए-मोहब्बत बख़्शा
मेरे अपने मुझे नफ़रत की सज़ा देते हैं.

ये है वो ग़ज़ल (सुनने के लिए यहां क्लिक करें)

कोई दोस्त है ना रक़ीब है,
तेरा शहर कितना अजीब है.

वो जो इश्क़ था वो जुनून था,
ये जो हिज्र है ये नसीब है.

यहां किसका चेहरा पढा करूं,
यहां कौन इतना क़रीब है.

मैं किसे कहूं मेरे साथ चल,
यहां सब के सर पे सलीब है.
तेरा शहर कितना अजीब है.

2 Comments:

Anonymous Anonymous said...

Neeraj Ji Aap ka yah prayas bahut hi utshahjanak aur sarahneya ha jo dusro ko bhee prarit karta ha ki kuch rachanatmack hamesa karta rahana chahiya :Sachi Tripathi Noida

6:06 AM  
Blogger à¤¨à¥€à¤°à¤œ दीवान said...

ख़ुशी हुई कि आप उर्दू अदब का शौक रखते हैं. मैं खुद बहोत कम लिखता हूं. चंद शेर लिखे हैं, आहिस्ता - आहिस्ता ब्लाग पर प्रकाशित करुंगा. वैसे आपको पढकर खुशी हुई. फिर मेरा पन्ना देखें तो आप मजाज़ की बेहतरीन नज़्म "आवारा" पढ सकेंगे. लिखते रहेंगे

8:31 AM  

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