Saturday, August 06, 2005

दोस्त बन-बन के मिले मुझको मिटाने वाले

(सुनने के लिए यहां क्लिक करें)

दोस्त बन-बन के मिले मुझको मिटाने वाले,
मैने देखे हैं कई रंग बदलने वाले.

तुमने चुप रहके सितम और भी ढाया मुझ पर,
तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पर हंसने वाले.

मैं तो इख़लाक़ के हाथों ही बिका करता हूं,
और होंगे तेरे बाज़ार में बिकने वाले.

आख़री बार सलाम दिल-ए-मुज़्तर ले लो,
फिर ना लौटेंगे शब ए हिज्र पे रोनेवाले.
- सईद राही

2 Comments:

Blogger sumir said...

तुमने चुप रहके सितम और भी ढाया मुझ पर,
तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पर हंसने वाले.

मैं तो इख़लाक़ के हाथों ही बिका करता हूं,
और होंगे तेरे बाज़ार में बिकने वाले.

I liked the two Ashar.

I remember reading Rahi's poetry on some other blog. I think it was of Jitendra Chaudhary. I find Rahi's to my wave length. I may soon come with similar Ashaars but with different tone.

Neeraj are you writing poetry also.

3:14 AM  
Blogger Neeraj said...

ख़ुशी हुई कि आप उर्दू अदब का शौक रखते हैं. मैं खुद बहोत कम लिखता हूं. चंद शेर लिखे हैं, आहिस्ता - आहिस्ता ब्लाग पर प्रकाशित करुंगा. वैसे आपको पढकर खुशी हुई. फिर मेरा पन्ना देखें तो आप मजाज़ की बेहतरीन नज़्म "आवारा" पढ सकेंगे. लिखते रहेंगे

8:31 AM  

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