Tuesday, August 16, 2005

शर्मिंदा कर रही दो ख़बरें


दो ख़बरें सुनने-पढ़ने मिलीं. पहली यह कि एक निजी ख़बरिया चैनल के कुछ कर्मियों ने शराब के नशे में बार कर्मियों और पुलिसवालों के साथ मारपीट की. दूसरी यह कि नेताओं की पोल खोलने का दावा करने वाले एक प्रोडक्शन हॉउस की इमारत पर १४ की शाम से लेकर १६ अगस्त की सुबह तक तिरंगा लहराता रहा. देश-दुनिया के लोगों को जागरूक करने और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास कराने का दावा करने वाले मीडियाकर्मियों के लिए दोनों ख़बरें शर्मनाक हैं. कुछ अरसे पहले ऐसी ही एक ख़बर पढ़ने मिली थी जब सबसे तेज़ होने का दावा करने वाले ख़बरिया चैनल के एक नामी ख़बरनवीस छावनी इलाक़े के नो-पार्किंग ज़ोन में अपनी कार खड़ी करने पर आमादा हो गया और नशे में धुत इस ख़बरनवीस ने ड्यूटी पर तैनात सैनिक से मारपीट की.
अक्सर सुनते आए हैं कि सत्ता का नशा सर चढ़कर बोलता है. इन्हे कौन सा नशा चढा? सत्ता के गलियारों में गूंजती इनकी धमक क्या अब आमजनों का जीना मुहाल करेगी? बैलगाड़ी के नीचे चल रहे कुत्ते को अक्सर ये गुमां हो जाता है कि सारा बोझ उसके कंधों पर है. नीर-क्षीर विवेकी लोगों से मेरी गुज़ारिश है ऐसा कोई भ्रम ना पालें कि हम संविधान और क़ानून से बड़े हो गए हैं.

Sunday, August 14, 2005

मै आज़ाद हूं


भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश (७१ के पहले पूर्वी पाकिस्तान) की आज़ादी का दिन १४-१५ अगस्त हमें यह याद दिलाता है कि हम आज़ाद हो चुके हैं. मुझे ये कहने में कतई संकोच नहीं कि बेशक़ हम आज़ाद हुए हैं लेकिन आज़ादी के दीवानों ने ऐसे देश का सपना नहीं देखा था. आज इतना बड़ा पाखंड इन देशों के सियासतदानों ने खड़ा कर लिया है कि लोकतंत्र दम तोड़ता नज़र आता है. पाकिस्तान और बांग्लादेश का छोड़ दें क्योंकि ये देश जब तक धार्मिक (?) बेड़ियों में जकड़े हुए हैं तब तक किसी तरह की जम्हूरियत की बात करना भी बेमानी होगी. लेकिन भारत की लोकतांत्रिक मान्यताएं यथार्थ में किस कदर खंडित हुई हैं ये आप बखूबी जानते हैं. ५८ साल में हमारा लोकतंत्र इस कगार पर आ पहुंचा है जहां क़ानून तोड़ने वाले संसद में बैठकर आम आदमी के लिए क़ानून बनाते देखे जा रहे हैं. एक डाकू खुलेआम कहता है कि फ़लां मुख्यमंत्री मेरे भाई समान है. डाकूजी को धन्यवाद जिसने एक बड़े राज्य के मुख्यमंत्री को अपने पाले में रखने का साहस दिखाया. कहीं कुछ गड़बड़ है. वो घोड़े वाले डाकुओं के दिन लदे तो अब सफ़ेद चमचमाती कारों वाले डाकुओं के दिन आ चुके हैं. ऐसे में ज़ाहिर है कि चंबल के दस्यु भी राजनीति का मोह कैसे छोड़ दें. जो सदन ५९ साल पहले नेहरू, आंबेडकर, मौलाना आज़ाद, चेट्टियार, राजेंद्र प्रसाद, जैसों की मौजूदगी का गवाह था, आज अपने दामन में सवा सौ दाग़ियों का दाग़ लिए अपने को शर्मिंदा महसूस करता होगा. ये चारा चोर, गुजरात-दिल्ली के जनसंहारों में शामिल ये नराधम, इस लोकतंत्र के पहरेदार बन बैठे हैं. ये मुंबई-भागलपुर समेत तीन हज़ार छोटे-बड़े दंगों के गुनहगार देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण रखने का दावा कर रहे हैं.

इनको अपनों के बीच झंडा थामे ऱखने का हक़ हम ही ने तो दिया है. ये लोग ही आज इस पावन दिन पर तिरंगे को हवा में लहराएंगे और जयहिंद का जयघोष करेंगे, हम तालियां पीटेंगे. लेकिन हमारा अंतर्मन छातियां पीटता है. मातम करता है कि क्या से क्या बना डाला है हमने मुल्क़ों को. हम चुप रहेंगे क्योंकि सदियों पुरानी आदत है ग़ुलामी की. आओ तुर्को, मुग़लों, डचों, अंग्रेज़ों हमें आप ही संभालो. आओ अपने 'ख़ानदान' की विरासत संभालो. आओ धर्म के ठेकेदारों, भगवा चोला उतारो और कुर्सी पर विराजो. आओ मेरे आका! क्योंकि हम बुद्धिजीवी (?) पहले ही मान चुके हैं राजनीति गंदा खेल है. तो क्या गंदों के लिए छोड़ दिया जाए ??

बड़ी तरक्क़ी कर ली इन दशकों में हमने. चंद सरमायेदारो की पूंजी में हो रहा दूगुना- तिगुना इज़ाफ़ा पूरे देश की माली हालत का थर्मामीटर बन गया है. करोड़पतियों की तादाद में बढ़ोतरी की ख़बरों से हमें सुकून मिलता है. बाज़ार में ख़र्च हो रहे बिग बी हमें सिखाते हैं कि उम्मीद (जिसका हक़ कतई नहीं है) से दोगुना कैसे कमाया जाए. कैसे हम लाखों फ़ोन और एसएमएस करके बाज़ारतंत्र के पुर्ज़े बनकर अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हैं. लेकिन हमने क्या ये सोचा कि देश के हर नागरिक की आय में दूगुना-तिगुना इज़ाफ़ा क्यों नहीं हो रहा है? क्यों 'दुनिया के नक़्शे पर तेज़ी से उभरते भारत'- जैसी ख़बरों के बीच ये अंदाज़ लगाना मुश्किल हो रहा है कि हम कहां जा रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ का मानव विकास सूचकांक बताता है कि हम दुनिया के १७७ देशों में १२७वें नंबर पर हैं हमारा सहोदर पाकिस्तान १४२ और बांग्लादेश १३८वें नंबर पर आता है. यह वो पैमाना है जिसमें किसी भी देश के समग्र विकास को आंका जाता है.

आंकड़ें साफ़ बताते हैं कि समाजवादी लोककल्याणकारी राज्य की परिकल्पना कचरे की पेटी में डाल दी गई है. उधारीकरण के दौर में गहराती आर्थिक विषमता की ओर हम आंख मूंद कर बैठे हैं. यक़ीनन देश में करोड़पतियों की तादाद में इज़ाफ़ा हुआ है, लेकिन इसी देश में हर साल तक़रीबन पौने दो करोड़ नए नागरिक जन्म लेते हैं. ग़रीबी रेखा के नीचे जी रही २६ करोड़ की आबादी जस की तस बनी हुई है. जिन लोगों ने उड़ीसा, बिहार, छत्तीसगढ़ और आंध्र के देहाती इलाक़ों के हालात का जायज़ा लिया हो वो कैसे यक़ीन कर सकते हैं कि देश फ़ीलगुड कर रहा है. जाकर तमिलनाडु के तिरपुर के लोगों से पूछो कैसे उधारीकरण ने घरेलू बाज़ार का भठ्ठा बिठाया है. उड़ीसा के रायगढ़ा, छत्तीसगढ़ के बस्तर जाकर देखें कि आदिवासी किस तरह अपनी ही ज़मीन से बेदख़ल किए जा रहे हैं. इनके रहवास का विधेयक सालों से सदन में अपने पारित होने की बांट जोह रहा है. संसद को कब फ़ुर्सत मिलेगी विरोध के लिए विरोध की राजनीति से - ये मालिक जानें. डेढ़ लाख से ज़्यादा छोटे-मंझोले उद्योग चरमरा चुके हैं और लाखों बेरोज़गार हुए हैं और रहनुमा दावा करते हैं हर चुनाव पर कि करोड़ों को रोज़गार मिलेगा. पंजाब के चंद किसानों को पंचतारा संस्कृति में सराबोर दिखाकर ये मीडिया ये दावा कैसे कर सकती है कि देश का आम किसान-मज़दूर फ़ीलगुड कर रहा है. उसी पंजाब में, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में आज भी किसान आत्महत्या करने पर विवश हैं. क्या ये हम भूल जाएं. ? क्या हमारी नई सरकार ये भूल गई कि पिछली सरकार के इसी फ़ीलगुड के नारे की आमजनता ने किस कदर हवा निकाली थी. अफ़सोस कि आज मनमोहन सिंह भी कुछ इसी तर्ज पर बातें करते हैं. वरना वे ऑक्सफ़ोर्ड में ये नहीं कहते हैं कि नाउ इंडिया इज़ रियेली शाइनिंग. इंडिया टुडे और आऊटलुक के ताज़ा अंक शायद यह न कहते कि भारत खुशहाल हो रहा है. एमएनसीज़ में काम करने वालों की तादाद में हो रहे इज़ाफ़े और इनके भयावह परिणामों व अनिश्चिंतता पर कभी और चर्चा करूंगा.

मध्यवर्गीय, उच्च मध्यवर्गीय और नीश क्लास लोगों के आसपास इकट्ठा हुआ बाज़ार और उसकी बाग़डोर थामे ईस्ट इंडियानुमा एमएनसीज़ तथा उनके इशारे पर दुम हिलाते चैनल्स-न्यूज़पेपर्स लगातार ये शोर मचाते हैं कि देखो इंडिया इज़ रियेली शाइनिंग. रियेली इज़ इट?

तुम्हारे पांव के नीचे ज़मीन नहीं
कमाल है तुम्हें फिर भी यक़ीन नहीं (दुष्यंत कुमार)

आज़ादी के दीवाने



पंजाब केसरी में आज स्वाधीनता दिवस पर प्रकाशित ये कार्टून बहुत कुछ कह रहा है.

Saturday, August 13, 2005

द राइज़िंग- प्रशंसनीय प्रयास


निष्णात् सिने-समीक्षक जयप्रकाश चौकसे (इंदौर वाले) का ताज़ा लेख जो आमिर ख़ान की फ़िल्म द राइज़िंग पर केंद्रित है – आपके लिए यहां जस का तस प्रकाशित कर रहा हूं – उम्मीद है कि चौकसे की लेखन-शैली भी रूचिकर लगेगी.

द राइज़िंग- प्रशंसनीय प्रयास
संत रामदास के कथा वाचन की प्रशंसा सुनकर स्वयं श्री हनुमान साधारण आदमी के वेष में कथा सुनने पहुंचे. प्रसंग था अशोक वाटिका में शोक संतप्त सीता की व्यथा का. कथावाचक ने सफ़ेद फूलों से आच्छादित वाटिका में सीता माता के दुख का वर्णन किया. हनुमान जी ने प्रतिवाद किया कि फूल लाल थे, यहां तक कि उन्होंने अपना विराट स्वरूप भी दिखाया, परंतु कथा वाचक टस से मस नहीं हुए. नाराज़ हनुमान ने श्री राम से शिकायत की तो श्री राम ने कहा कि सीता का दुख देखकर हनुमान की आंखों में ख़ून के डोर उतर आए थे इसीलिए उन्हें सफ़ेद फूल लाल दिखे थे. कथावाचक ग़लत नहीं था.

केतन मेहता और आमिर ख़ान भी कथा वाचक हैं और मंगल पाण्डेय की कथा की अपनी व्याख्या के लिए स्वतंत्र हैं. इतिहास आधारित फ़िल्मों को केवल सिनेमा के मानदंड पर देखना चाहिए, न कि पाठ्यक्रम के इतिहास की तरह. द राइज़िंग में मंगल पाण्डेय के सत्य के साथ कल्पना के रेशे हैं और फ़िल्म के आरंभ में ही कहा गया है कि जहां इतिहास और किवदंती मिलते हैं यह कथा वहां जन्मी है. इस फ़िल्म मे उस दौर का सामाजिक सत्य उभरकर आया है और ईस्ट इंडिया कंपनी की घिनौनी हरकतों को प्रस्तुत किया गया है. कंपनी के अफ़सर अफ़ीम का अवैध व्यापार करते हैं और भारतीय खेतों में अफ़ीम पैदा करवाते हैं फिर चीन में बेचते हैं. इस अंतरराष्ट्रीय अपराध में वे हुक़मरान भी शामिल थे जो लंदन में बैठे थे. इसी तरह यह भी प्रस्तुत है कि क़ानूनी तौर पर सती प्रथा के समाप्त हो जाने के बाद भी वह प्रथा जारी थी. व्यापार करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी आज भी नए मुखौटे पहनकर ज़िंदा है. आज उन्हें मल्टीनेशनल का सम्मानजनक नाम प्राप्त है, परंतु हरकतें वहीं हैं. ग़ौरतलब है कि अस्पताल के दृश्य में मंगल पाण्डेय कहता है कि विद्रोह की चिनगारी इस बात से पैदा हुई थी कि नई कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी है, परंतु सच्चाई यह है कि हमें स्वतंत्रता चाहिए. इस पवित्र आंदोलन में अब चर्बी गौण है और आत्मसम्मान प्रमुख है. इस फ़िल्म में दो दोस्तों की कहानी है- अंग्रेज़ और भारतीय योद्धा. वीरता के समान मंच पर पनपी इस मित्रता के महत्वपूर्ण मोड़ पर मंगल पाण्डेय कहता है कि यह रंग का भेद नहीं मिट सकता. इस फ़िल्म में दो प्रेम कहानियां समानांतर चलती हैं- मंगल और तवायफ़ हीरा तथा अंग्रेज़ गोर्डन और युवा लड़की, जिसे सती होने से उसने बचाया था. फांसी के पहले हीरा जेल में आकर मंगल से कहती है कि उसकी मांग भर दे. यह अत्यंत मार्मिक है. यह नाज़ुक प्रेमकथा उस पौधे की तरह है जो हालात के पत्थरों के बीच थोड़ी-सी मिट्टी में पनपता है और यथार्थ के पैरों तले उसका कुचला जाना ही उसकी नियति है. गोर्डन और ज्वाला तथा मंगल और हीरा के मिलन के एकमात्र दृश्य में रसिया नामक लोकगीत का प्रयोग सिनेमैटिक लहर पैदा करता है. आमिर ख़ान इतने महान अभिनेता हैं कि चर्बी की फ़ैक्ट्री वाले दृश्य में उनकी नाक पर हल्का कंपन बदबू को स्थापित करता है.

आज आमिर भारत के श्रेष्ठतम अभिनेता हैं. द राइज़िंग एक गंभीर सिनेमाई प्रयास है और आमिर तथा केतन मेहता बधाई के पात्र हैं. फूहड़ और सतही मनोरंजन से बिगड़ी हुई रूचियों वाले पॉपकॉर्न दर्शकों के लिए यह दालबाटीनुमा गरिष्ठ भोजन पचा पाना शायद मुश्किल होगा.
फ़िल्म की आधिकारिक साइट यहां देखें और यह साइट भी कम रोचक नहीं है. द राइज़िंग के गीत यहां सुने जा सकते हैं.

Friday, August 12, 2005

बर्बाद तमन्ना पे अताब और ज़्यादा

मजाज़ को जाने..समझने का दावा बिना पढ़े कतई ना करें
छोटा-सा परिचय - उत्तरप्रदेश के बाराबांकी ज़िले के रुदौली में १९०९ में जन्में असरार उल हक़ की शुरूआती तालीम लखनऊ और बाद आगरा में हुई. १९३६ में आपने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीए किया. ये वो दौर था जब अलीगढ़ यूनीवर्सिटी में प्रगतिशील आंदोलन की शुरूआत हुई थी. मजाज़ खुद इससे प्रभावित थे. आपने ऑल इंडिया रेडियो में भी काम किया लेकिन बाद किन्हीं मतभेदों के चलते इसे छोड़ दिया. आप प्रगतिशील (प्रोगेसिव मूवमेंट) आंदोलन की पत्रिका नया अदब के संस्थापकों में से एक थे. माना जाता है कि फनी बदायूंनी आपके उस्ताद थे. शायद पढ़नेवालों को पता हो कि मजाज़ आज के दौर के मशहूर गीतकार जावेद अख़्तर के मामा हैं. ये तो पता ही होगा कि जावेद साहब अपने ज़माने के मशहूर गीतकार जां निसार अख़्तर के बेटे हैं. मजाज़ पर वापस लौटें, मजाज़ का पहला ग़ज़ल संग्रह 'आहंग' १९३८ में आया. इसके बाद १९४५ में 'शब-ए-ताब' और 'साज़-ए-नौ' भी प्रकाशित हुए. मक़बूल नज़मों में 'आवारा', 'रात और रेल' के अलावा 'अंधेरी रात का मुसाफ़िर' भी अहम है. पांच दिसम्बर १९५५ को लखनऊ में मजाज़ इस दुनिया से चल बसे.

असरार उल हक़ 'मजाज़' की ये ग़ज़ल दिखाई पढ़ी. सबसे नीचे दिए गए चंद लफ़्ज़ों के मायने आपके लिए मददगार हो सकते हैं.

बर्बाद तमन्ना पे अताब और ज़्यादा
हां मेरी मोहब्बत का जवाब और ज़्यादा


रोए ना अभी अहल-ए-नज़र हाल पे मेरे
होना है अभी मुझको ख़राब और ज़्यादा


आवारा-वा-मजनूं ही पे मौक़ूफ़ नहीं कुछ
मिलने हैं अभी मुझको ख़िताब और ज़्यादा

उठेंगे अभी और भी तूफ़ां मेरे दिल से
देखूंगा अभी इश्क़ के ख़्वाब और ज़्यादा


टपकेगा लहू और मेरे दीदा-ए-तर से
धधकेंगे दिल-ए-ख़ाना-ख़राब और ज़्यादा


ऐ मुतरिब-ए-बेबाक कोई और भी नग़मा
ऐ साक़ी-ए-फ़याज़ शराब और ज़्यादा

(अताब- ग़ुस्सा; मौक़ूफ़-निर्भर; दीदा ए तर- नम आंखें; मुतरिब- गायक)

Tuesday, August 09, 2005

एक हफ़्ते की माथापच्ची के बाद आज इन्स्क्रिप्ट की-बोर्ड पर यूनीकोड फॉट टाइप करने का तरीका आ ही गया... सलाह के लिए जीतेंद्र और रमन कौल को साधुवाद. माइक्रोसाफ्ट का इण्डिक आइ-एम-ई लोड कर लिया है. बड़ी मशक़्क़त के बाद चलाना भी सीख लिया. यार ख़बरनवीस हूं मुझे तकनीक की इतनी समझ कहां ? नेटसाधुओं को एक बार फिर साधुवाद. जिनको इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड में यूनीकोड फॉट पर हिन्दी टाइप करना हो तो ये बढ़िया संपादक है. कम से कम मेरे उस संपादक से तो बेहतर है.

Monday, August 08, 2005

क़ातिल का फ़ैसला है ख़ुद क़ातिल के हाथ.


दिल्ली और गुजरात - १९८४ और २००२

सोमवार ८ अगस्त को सिख दंगों की जांच के लिए बने नानावटी आयोग की रिपोर्ट देश की संसद के पटल पर रखी गई. ८४ के दंगों में अकेली दिल्ली में तीन हज़ार सरदार मारे गए थे. वेद मारवाह कमेटी से नानावटी आयोग तक कुल नौ आयोग और कमेटियां बन चुके हैं और तीन हज़ार लोगों की हत्या के लिए सिर्फ़ नौ लोगों को अब तक दोषी क़रार दिया गया है. यानी हमारी वो सरकार जो ८४ से लेकर ८९ और फिर ९१ से ९६ तक सत्ता में रही और २००४ में सरदार मनमोहन सिंह की अगुवाई में फिर सत्ता पर काबिज़ होती है - ने इन २१ सालों मे ये जांच करके बताया कि ३ हज़ार लोगों को सिर्फ़ ९ लोगों ने मार दिया वो भी तीन दिनों तक ये लोग दिल्ली की गलियों मे घूम घूम कर सरदारों के सर कलम कर रहे थे और सरकारी अमला नपुंसकों के जैसे हाथ बांधे खडा था.

नानावटी को दंगों में शामिल लोगों के खिलाफ़ कोई सुबूत नहीं मिलते हैं. जिन रसूखदारों पर उंगलियां उठती हैं, जिन पर शक़ ज़ाहिर किया जाता है तो सरकार उन्हें बचा ले जाती है. इन मंत्रियों के ख़िलाफ़ अगर कोई सर उठा ले और गवाही देने आगे आ भी जाय तो धन- बल से उसका मुंह बंद कर दिया जाता है. ठीक वैसे जैसे बेस्ट बेकरी मामले में होता है. कैसे सर्वोच्च न्यायालय की लताड सुनकर भी इन्हें शर्म ना आती हो . कैसे कल तक मोदी को मुस्लिम द्रोही बताने वाली ज़ाहिरा पलटकर तीस्ता सीतलवाड को ही कटघरे में ले आती है. कैसे इन बेशर्मों को ये कहने से भी गुरेज़ नही होता कि गुजरात को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है. ये है हिन्दुत्व की एक सरकार और दूजी है सेक्यूलरिज़्म का दंभ भरने वाली कांग्रेस सरकार ! जिसके बारे में नानावटी आज ये तो कह ही देते हैं कि ८४ के दंगों मे कांग्रेस की स्थानीय इकाइयों का हाथ था. अब इसी नानावटी के ज़िम्मे गुजरात दंगों की जांच भी हो रही है.

ऐसी सरकार जिसका प्रधानमंत्री (अब दिवंगत) कहता है - जब कोई बडा वृक्ष गिरता है तो आसपास की धरती हिलती ही है ! वो मुख्यमंत्री है जो कहता है कि गुजरात का तांडव गोधरा की परिणीति है - एक्‍शन क। रिएक्‍शन !! एक लोकतांत्रिक देश जो अपने धर्म निरपेक्ष होने का दावा करता हो जहां की सरकारें दंगों को वोट बटोरने वाला प्रायोजित कार्यक्रम बनाती हों - जहां सरकारी तंत्र षडयंत्र का हिस्सा बन जाता हो - जहां चुन चुनकर मुसलमानों, सिखों और दलितों को निशाना बनाया जाता हो, गवाह रातों-रात बदल दिये जाते हों और आरोपी बा इज़्ज़त बरी हो जाते हों - वहां किस इंसाफ़ की उम्मीद करें ?


इंसाफ़ क्या मिलेगा किसी दादेख़्वा को,
क़ातिल का फ़ैसला है ख़ुद क़ातिल के हाथ.

Sunday, August 07, 2005

ऐ ग़म ए दिल क्या करूं


सागर के कहने पर वो नज़्म जो मजाज़ की लिखी है, मै यहां लिख देता हूं. बाद ये तय हो जाएगा कि यक़ीनन मजाज़ पर प्रगतिशील लेखन का ज़बर्दस्त असर पडा. जगजीत जी ने इसके चंद शेरों को अपनी आवाज़ दी थी.. असरार उल हक़ 'मजाज़' की ये नज़्म आप पढें.

इस ग़ज़ल के चंद शेर यहां तरन्नुम में सुनें -


शहर की रात और मैं नाशाद-ओ-नाकारा फिरूं
जगमगाती जागती सडकों पे आवारा फिरूं
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-बदर मारा फिरूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

झिलमिलाते क़ुमक़ुमों की राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में दिन की मोहनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर दहकी हुई शमशीर सी
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

ये रुपहली छांव ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तस्व्वुर जैसे आशिक़ का ख़्याल
आह लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हाल
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

फिर वो टूटा इक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में आई ये मोती की लड़ी
हूक-सी सीने में उट्ठी, चोट-सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

रात हंस हंसके ये कहती है कि मैख़ाने में चल
फिर किसी शाहनाज़े-लाला-रुख़ के काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

हर तरफ़ है बिखरी हुई रंगीनियां रानाइयां
हर क़दम पर इशरतें लेती हुई अंगडाइयां
बढ रही है गोद फैलाए हुए रुसवाइयां
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

रास्ते में रुक के दम ले लूं मेरी आदत नहीं
लौटकर वापस चला जाउं मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवां मिल जाए ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

मुन्तज़िर है एक तूफ़ाने-बला मेरे लिए
अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिए
पर मुसीबत है मेरा अहदे-वफ़ा मेरे लिए
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

जी में आता है अब अहदे-वफ़ा भी तोड़ दूं
उनको पा सकता हूं मैं, ये आसरा भी छोड़ दूं
हां मुनासिब है, ये ज़ंजीरे-हवा भी तोड़ दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

इक महल की आड से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब
जैसे मुफ़लिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

दिल में इक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूं
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूं
ज़ख्‍म सीने में महक उठा है, आख़िर क्या करूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

जी में आता है ये मुर्दा चांद तारे नोच लूं
इस किनारे नोच लूं और उस किनारे नोच लूं
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने
सैकडों चंगेज़ो नादिर हैं नज़र के सामने
सैकडों सुलतानो जाबिर हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

बढ के इस इन्द्रसभा का साज़ ओ सामां फूंक दूं
इस का गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं
तखते सुलतान क्या मैं सारा क़स्र ए सुलतान फूंक दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

मायने - नाशादो-नाकारा-उदास और बेकार, क़ुमक़ुम- बिजली की बत्ती, शमशीर- तलवार, तसव्वुर- अनुध्यान, मैखाना- मधुशाला, शहनाज़े लाला रुख़- लाल फूल जैसे मुखड़े वाली, काशाने- मकान, इशरत- सुखभोग, फ़ितरत- स्वभाव या प्रकृति, हमनवा- साथी, तूफ़ाने-बला- विपत्तियों का तूफ़ान, वा- खुले हुए, अहदे-वफ़ा- प्रेम निभाने की प्रतिज्ञा, माहताब-चांद, अमामा- पगड़ी, मुफ़लिस- ग़रीब, शबाब- यौवन, मज़ाहिर- दृश्य, सुल्ताने जाबिर- अत्याचारी बादशाह, शबिस्तां- शयनागार, क़स्रे सुल्तान- शाही महल

दोस्ती जब किसी से की जाए

दोस्ती जब किसी से की जाए,
दुश्मनों की भी राय ली जाए.

मौत का ज़हर है फिज़ाऒ में,
अब कहां जा के सांस ली जाए.

बस इसी सोच में डूबा हुआ,
ये नदी कैसे पार की जाए.

मेरे माज़ी के ज़ख़्म भरने लगे,
आज फिर कोई भूल की जाए.

बोतलें खोलके तो पी बरसों,
आज दिल खोल कर पी जाए.

(माज़ी - past, old days)

Saturday, August 06, 2005

मेरे अपने मुझे नफ़रत की सज़ा देते हैं

Friendship Day को दोस्ती की यादगार कहो या दोस्त बनाने का बेहतरीन मौक़ा. अपना तजुर्बा हमेशा ही उल्टा रहा है कुछ इन ग़ज़लों की तरह. अपने में ही रही होगी कोई कमी.. तभी इस कम्ब्ख़त को ये सब रोना - धोना याद आ जाता है. आप भी हमख़्याल हो तो दो आंसू आप भी बहा लीजिए.. पहले ये शेर पढिए-

मैने दुश्मन को भी अहसास-ए-मोहब्बत बख़्शा
मेरे अपने मुझे नफ़रत की सज़ा देते हैं.

ये है वो ग़ज़ल (सुनने के लिए यहां क्लिक करें)

कोई दोस्त है ना रक़ीब है,
तेरा शहर कितना अजीब है.

वो जो इश्क़ था वो जुनून था,
ये जो हिज्र है ये नसीब है.

यहां किसका चेहरा पढा करूं,
यहां कौन इतना क़रीब है.

मैं किसे कहूं मेरे साथ चल,
यहां सब के सर पे सलीब है.
तेरा शहर कितना अजीब है.

दोस्त बन-बन के मिले मुझको मिटाने वाले

(सुनने के लिए यहां क्लिक करें)

दोस्त बन-बन के मिले मुझको मिटाने वाले,
मैने देखे हैं कई रंग बदलने वाले.

तुमने चुप रहके सितम और भी ढाया मुझ पर,
तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पर हंसने वाले.

मैं तो इख़लाक़ के हाथों ही बिका करता हूं,
और होंगे तेरे बाज़ार में बिकने वाले.

आख़री बार सलाम दिल-ए-मुज़्तर ले लो,
फिर ना लौटेंगे शब ए हिज्र पे रोनेवाले.
- सईद राही

मित्र ऐसे कि ख़ून के रिश्ते फीकें पड जाऎ


मित्र बनाने और आजीवन निभाने की परंपरा
(छतीसगढ की मिट्टी से ही मैं आया हूं लिहाज़ा Friendship Day पर यह आलेख प्रासंगिक बन पडा है. पूरा आलेख पढने के लिए यहां क्लिक करें )

भारत में फ़्रेंडशिप डे मनाने की प्रथा भले आज चलन में आई हो, छत्तीसगढ़ में मित्र बनाने और मित्रता निभाने की एक लंबी सांस्कृतिक परम्परा रही है. अगस्त के पहले रविवार को मनाया जाने वाला फ़्रेंडशिप डे तो एक दिन का मामला है लेकिन छत्तीसगढ़ की यह परंपरागत मित्रता ऐसी होती है कि इसके आगे ख़ून के रिश्ते फीके पड़ जाएँ.

मित्र बनाने की इस परम्परा में ना उम्र का बंधन है, ना ही जाति या वर्ण का. एक बार मित्र बन गए तो जीवन भर उस मित्रता का निर्वाह सगे रिश्ते-नातों से कहीं बढ़कर किया जाता है.

मितान बदना

मित्र बनाने की इस परम्परा को छत्तीसगढ़ में मितान या मितानिन 'बदना' कहते हैं. इस 'बदना' का मतलब है एक तरह से अनुबंध की औपचारिकता. दो पुरुष या दो महिलाएँ आपस में एक दूसरे को मितान बनाने के लिए एक दिन नियत करते हैं और मितान बद लेते हैं.

कहीं फूलों का आदान-प्रदान किया और मित्र बन गए, तो कहीं गंगा जल या तुलसी के पत्तों का आदान-प्रदान हुआ. एक छोटे-से आयोजन में गौरी-गणेश और कलश की पूजा के बाद एक दूसरे को कोई पवित्र चीज़ देकर मितान 'बदा' जाता है.

कहीं-कहीं एक दूसरे का नाम अपने हाथों पर गुदवा कर (यानी उसका नाम अपने हाथ में स्थाई टैटू की तरह लिखवाकर) मितान बनने की भी परम्परा है. हालांकि स्वाभाविक सामाजिक परिवेश की वजह से इस परंपरा का विस्तार दो विपरीत लिंग वाले लोगों के बीच नहीं हो सका. यानी कोई पुरुष किसी महिला के साथ मितान नहीं बद सकता.

पीढ़ियों का साथ

इस मित्रता के कई नाम हैं, हालांकि व्यावहारिक रुप से सब एक से ही हैं. मितान बनाने के लिए आदान प्रदान की जाने वाली चीज़ के आधार पर इनके नाम भी हैं- भोजली मितान, दौनापान, गंगाजल, सखी, महाप्रसाद, गोदना, गजामूंग.

दो पुरुष आपस मे मितान होते हैं और दो महिलाएँ मितानिन. श्रावण मास की सप्तमी को धान के बीज बो कर उसे पूजने की परम्परा यहां रही है, जिसे भोजली कहा जाता है.
रक्षाबंधन के दूसरे दिन इस भोजली को विसर्जित किया जाता है. छत्तीसगढ़ में एक दूसरे को इसी भोजली को कानों में लगा कर भोजली मितान बनाने की प्रथा चलन में ज़्यादा है.

एक बार मितान या मितानिन बन जाने के बाद मित्र को नाम ले कर संबोधित करने की परंपरा नहीं है. जब भी मित्र को संबोधित करना होगा तो केवल मितान कह कर या जिस परम्परा के तहत मितान बदा गया है, उसे ही संबोधन के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

किसी ने आपस में प्रसाद का आदान-प्रदान कर एक दूसरे को मित्र बनाया है तो दोनों आजीवन एक दूसरे को महाप्रसाद के नाम से संबोधित करेंगे.

इसी तरह किसी महिला ने अगर मोगरे का फूल देकर मितानीन बनाया है तो वे एक-दूसरे को लिए फूलमोंगरा या मोंगराफूल के संबोधन का इस्तेमाल करेंगी.

अब दिल का दर्द लेकर

कल अख़बार में शकील बदायुनी का ये शेर पढा, भा गया, आप भी देखें

अब दिल का दर्द लेकर इन्क़लाब आया तो क्या,
एक दोशीज़ा पर ग़ुरबत में शबाब आया तो क्या.
अब तो आंखों पे ग़म - ए - हस्ती के पर्दे पड गए,
अब कोई हुस्न- ए- मुज़स्सिम बेनक़ाब आया तो क्या.

(दोशीज़ा- लडकी; ग़ुरबत- ग़रीबी; हुस्न-ए-मुज़स्सिम-सिर से लेकर पैर तक)

Friday, August 05, 2005

आज कहां-क्या होगा?

ख़बरों की दुनिया में आगे रहने की बातें तो सभी करते हैं. की-बोर्ड के इस सिपाही ने अपने साथियों की सहूलियत के लिए एक नई कोशिश की है. आज से रोज़ाना हमारे साथियों को आनेवाले दिन की घटनाओं के बारे में जानकारी दी जाएगी. मेरी यह कोशिश ख़ासकर मेरे उन साथियों के लिए फ़ायदेमंद होगी जो स्वदेस से बाहर हैं या फिर वक़्त की कमी के चलते ख़बरों को पूरी तरह पढ़/देख नहीं पाते. पूरी सामग्री हिन्दी में लिखने में फ़िलहाल असमर्थ हूं. रोज़ाना आधी रात तक ताज़ा रपट अपडेट कर दी जाएगी.
उम्मीद है आपको यह पसंद आएगा...यहां क्लिक करें या फिर दाईं ओर लिंक्स में दिए गए विकल्पों का चुनाव करें. सुझाव-शिक़ायत आमंत्रित हैं.

Wednesday, August 03, 2005

हम सब की बात है..

मुझे अब तक ये अनुभव रहा कि हिंदी को दोयम दर्ज़े का माना जाता है. यहां आकर अहसास हुआ कि हक़ीक़त ये नहीं है बिलकुल नहीं. आप लोग जो यक़ीनी तौर पर उम्दा तालीमयाफ़्ता होंगे - से जो प्रतिसाद मेरे ब्लाग को शुरुआत में मिला है, इसके लिए आभारी हूं. आज मेरे साप्ताहिक अवकाश का दिन है लिहाज़ा ज़्यादा नहीं लिख रहा हूं. सामाजिक सरोकार और इससे हमारी चिंता सहज और स्वाभाविक है. कहूं तो इतनी टीप पढकर मेरी आंख से एक आंसू उतरा. यह आंसू खुशी का है. यह हौसला बढा गया कि इस लडाई में बहुतेरे साथ है, वो चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हों. किसी का शेर याद आ रहा है -

मैं चाहता हूं निज़ाम - ए - कुहन बदल डालूं,
मगर ये बात मेरे बस की नहीं .
हम सब की बात है,
दो - चार- दस की बात नहीं.

Tuesday, August 02, 2005

उधारीकरण में उधडी कामगारों की खाल


गुडगांव की होण्डा मोटर साइकिल ऎड स्कूटर इंडिया के एक हज़ार से ज़्यादा कर्मचारी २५ जुलाई को उदारीकरण के घिनौने स्वरूप का शिकार बने. पूंजीवाद के सरमायेदारों ने उस काले सोमवार को इन कर्मियों की खालों को जमकर उधेडा. इसी दिन दुनिया ने देखा कि कैसे चन्द उद्योगपतियों के इशारे पर प्रशासन तांडव करता है. कैसे श्रम शर्मसार किया जाता है. कैसे हमारे राजनेता गरम तवों पर रोटियां सेंकते हैं. पहले कंपनी ने कर्मचारियों के पेट पर लात मारी फिर वर्दीवाले गुंडों ने इनको पटक-पटककर मारा. पांच सौ से ज़्यादा प्रदर्शनकारी ग़िरफ्तार हुए, इनमें नौ (पुलिसिया रिपोर्ट के मुताबिक़) पुलिसवाले भी शामिल हैं. कर्मियों ने पहले पुलिस की जीप जलायी फिर पेट्रोल और डीज़ल से चलने वाली इस जीप की क़ीमत मज़दूरों के ख़ून से चुकाई.
मांग सिर्फ़ इतनी थी कि ये कर्मचारी अपने ५४ साथियों के अधिकारों की बात कंपनी मैनेजमेंट के सामने उठा रहे थे. फैक्ट्री में पहले कोई यूनियन नही था. कामगारों ने यूनियन बनाने की बात उठाई तो लेबर डिपार्टमेंट ने मान्यता देने से इंकार कर दिया. यह मामला प्रधानमंत्री तक गुहार लगाने तक पहुंचा. याद रहे ये आंदोलन पिछले तीन महीनों से जारी था. इससे पहले भी तक़रीबन पांच हज़ार श्रमिक शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर चुके थे. भूख हडताल भी शुरू की और इस दौरान एक कर्मी शहीद भी हुआ. किसे फ़िक्र हुई ?
इस दौर में हम मीडियाकर्मी फ़िक्रमंद हुए- मल्लिका के एमएमएस की ख़बरों से, आतंकवादियों की अरसे तक शरणस्थली रही लंदन के बम धमाकों से, दाउद कुनबे की शान-शौकतभरी शादी में आने-जाने वालों की ख़बरों से. किसे फ़िक्र हुई इन ख़बरों से कि राजधानी की नाक के नीचे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी खुले आम श्रम क़ानूनों का उल्लंघन कर रही है. अलबत्ता हम फ़िक्रमंद हुए कि लंदन के एक टेबलायड "सन" ने ख़ुलासा किया है कि इसी गुडगांव का एक काल सेंटर ग्राहकों की गोपनीय जानकारी को सार्वजनिक कर रहा है. इन ख़बरों का भोंपू बजाने वाले टीवी चैनलों ने क्या ये सोचा कि इस ख़बर से (बाद में निराधार निकली) वे देश के उन लाखों नौजवानों के बीच कैसी दहशत फैला रहे हैं जो इन काल सेंटरों में काम करते हैं? क्या हम जाने - अन्जाने ब्रिटिश मीडिया के हाथों नहीं खेले गये जो हमेशा आउटसोर्सिंग का विरोध करते आया है?
अब उन ख़बरों को देखे जो ख़बर ही न बन सकीं - देश के श्रम क़ानून में बदलाव किया जाने वाला है. इसके मुताबिक़ निजी क्षेत्रो को अपने यहां कामगारों को ता- उम्र काम पर रखने की अनिवार्यता ख़त्म होगी, केंद्र सरकार ये बदलाव कर राज्य सरकारों को आगे के संशोधनों के लिए भेजेगी. राज्य अपने मुताबिक़ इसमें फ़ेरबदल के लिए तैयार और ज़िम्मेदार (?) होंगे. श्रम विभाग के आंकडे बताते हैं कि देश में असंगठित क्षेत्र के कामगारों की तादाद मे इज़ाफ़ा हो रहा है. कामगार जो पसीना बहाकर कमाया जो पैसा सरकार के जीपीएफ़ (कर्मचारी भविष्य निधि) में जमा कराता है उसे शेयर बाज़ार मे दांव पर लगाने का हक़ सरकार को किसने दिया? यही जारी रहा तो आगे इन लाखों- करोडों मज़दूर - कामगारों का मुस्तक़बिल क्या होगा? "लोक कल्याणकारी राज्य" का हमारा संवैधानिक संकल्प याद दिलाने वाला कौन होगा?
विडंबना है कि आज वामदल उन लोगों के साथ हैं जो इस उदारीकरण के पुरोधा माने जाते हैं. चंद सरमायेदारो की पूंजी में हो रहा दूगुना- तिगुना इज़ाफ़ा पूरे देश की माली हालत का थर्मामीटर बन जाता है. ( इंडिया टुडे का ८ अगस्त का अंक पढें). हमने क्या ये सोचा कि देश के हर नागरिक की आय में दूगुना-तिगुना इज़ाफ़ा क्यों नही हुआ? इसी दौर में ये न्यायपालिका की महिमा रही कि हडताल को ग़ैरक़ानूनी करार दिया जाता है. निजीकरण और उदारीकरण के जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं वहां इसका और भी ज़्यादा विद्रूप चेहरा दिखाई देना अभी बाक़ी है. १९९१ में जो वैश्विक व्यापार के लिए खिडकियां खोलने की बात करते थे वे इस दफ़ा पूरा दरवाज़ा खोल चुके हैं. नवउदारवाद के राग आलाप रहीं तीसरी दुनिया के देशों की सरकारों पर चौ-तरफ़ा दबाव है.
आप निश्चिंत हैं, शायद खुश भी क्योंकि आग आपके घरों तक नही पहुंची है. इन हालत में दुष्यन्त कुमार का अशआर याद आता है-

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए.
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए.
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए.

क्या होता है ब्लू टूथ ?

क्या होता है ब्लू टूथ ? अरे भाई सब जानते हैं इस्तेमाल का तरीक़ा लेकिन ये होता क्या है ये भी तो जान लीजिए.. बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए.
दरअसल, डेनमार्क का एकीकरण करने वाले राजा हेराल्ड ब्लू टूथ के नाम पर बनी यह टेक्नॉलाजी सूचना के बेतार आदान-प्रदान में मदद करती है. इस टेकनॉलाजी पर आधारित उपकरण शॉर्ट रेडियो लिंक की मदद से आपस में बात करते हैं. मान लीजिए कि आप अपने मोबाइल फोन में पड़े फ़ोन नंबर कंप्यूटर में डालना चाहते हैं तो ब्लू टूथ की मदद से बिना तार लगाए यह काम संभव हो जाएगा. वैसे वायरसलैस तकनीक से भी उपकरणों को जोड़ा जा सकता है, लेकिन इन यंत्रों की प्रणाली एक होनी चाहिए. ब्लू टूथ की मदद से किसी भी श्रेणी के उपकरणो को जोड़ा जा सकता है. साथ ही इसकी मदद से उपकरणों के बीच बहुत ज़्यादा सूचना और डेटा का आदान-प्रदान भी संभव हैं.
अधिक जानकारी के लिए खुद ब्लू टूथ वालों की साइट पर जाइए (यहां क्लिक करें)